वाराणसी : सनातन धर्म में फैली तमाम तरह भ्रांतियां फैली हुई हैं। जिन्हे दूर करने के लिए ऋषि-मुनि और बुद्धिजीवी मंथन करते रहते हैं। यह मंथन इस बार के महाकुंभ में भी किया गया। सनातन धर्म के बारे में फैली भ्रांतियों को लेकर हिंदू आचार संहिता में बदलाव की जरूरत महसूस की गई। लेकिन इसे जारी नहीं किया जा सका। अब वाराणसी में संतों की सहमति के बाद काशी विद्वत परिषद अक्टूबर में हिंदू आचार संहिता जारी करने की तैयारी कर रही है। काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के मुताबिक़ हिन्दू आचार संहिता में कुछ ऐसी बातें हैं जो सनातन धर्म में फैली भ्रांतियों को कम करके लोगों के जीवन में निश्चित रूप से बदलाव लाएँगी। नई आचार संहिता में विवाह रात की बजाय दिन में करने, तेरहवीं भोज में 13 लोगों को भोजन कराने और गर्भगृह में केवल द्वितीय चक्रधारी को ही प्रवेश की अनुमति दी गई है। इसके अलावा कई अन्य बदलाव भी किए गए हैं।

काशी विद्वत परिषद के महासचिव प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि नई हिंदू आचार संहिता पर देशभर के संतों ने अपनी सहमति दे दी है। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य और देशभर के संतों की सहमति के बाद इसे आम जनता तक पहुँचाने की रणनीति बनाई गई है। नई हिंदू आचार संहिता में मंदिर के गर्भगृह में केवल पुजारियों को ही प्रवेश की अनुमति दिए जाने की बात कही गई है। अंतिम संस्कार भोज, जन्मदिन, गृह प्रवेश और दलितों के लिए भी नियम बनाए गए हैं। हिंदू आचार संहिता तैयार करने के लिए देशभर के धार्मिक स्थलों पर 40 बैठकें हुईं। मनु स्मृति, पाराशर स्मृति और देवल स्मृति को आधार बनाया गया है और स्मृतियों के साथ-साथ भगवद्गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के महत्वपूर्ण अंशों को भी इसमें शामिल किया गया है। 70 विद्वानों की 11 टीमें और तीन उप-टीमें बनाई गईं। प्रत्येक टीम में उत्तर और दक्षिण से 5-5 विद्वान शामिल रहे।
प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने आगे बताया कि नई आचार संहिता में कन्या भ्रूण हत्या को पाप घोषित किया गया है। पुरुषों के समान ही महिलाओं के समान अधिकारों की बात की गई है। प्रावधान है कि महिलाएं भी यज्ञ आदि कर सकेंगी। हिंदू आचार संहिता में घर वापसी का मार्ग सुगम बनाया गया है। अगर कोई हिंदू धर्म में वापस आना चाहता है, तो उसके लिए एक सरल तरीका बताया गया है। जो भी ब्राह्मण उन्हें शुद्ध करेगा, वह उसे अपना गोत्र बता देगा। प्रोफ़ेसर रामनारायण द्विवेदी बताते हैं कि नई आचार संहिता में विवाह की सबसे ज़रूरी बातों को भी बदलने की तैयारी की गई है। पहले सनातन धर्म में विवाह दोपहर के समय होते थे। लेकिन मुगल शासन के दौरान जब आक्रमणकारियों के हमले शुरू हुए, तो विवाह रात के अंधेरे में होने लगे। लोगों ने इसे नियम बना लिया। जबकि हमारे शास्त्रों में दिन में विवाह करने की परंपरा है। हमें रात में करने में कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन शास्त्रों के अनुसार विवाह दिन में हो तो बेहतर है।
आपको बता दें कि महाकुंभ में संतों की बैठक में हिंदू आचार संहिता को लेकर चर्चा हुई। अब काशी विद्वत परिषद इसे अक्टूबर 2025 में सार्वजनिक करेगी। पहले चरण में 356 पृष्ठों वाली आचार संहिता की एक लाख प्रतियाँ छपवाकर हिंदुओं के घर-घर पहुँचाई जाएँगी। नई संहिता में विवाहों में होने वाले फिजूलखर्ची को रोकने की व्यवस्था की गई है। वैदिक परंपरा के अनुसार, दिन में विवाह करने के निर्देश हैं। विवाह में कन्यादान के अलावा दहेज पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। विवाह पूर्व विवाह पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है और मृत्युभोज के लिए संख्या निर्धारित कर दी गई है। केवल 13 लोगों को भोज देकर परंपरा का पालन किया जा सकेगा।
काशी विद्वत परिषद लगभग 108 वर्ष पुरानी संस्था है, जिसकी सनातन धर्म से जुड़े सभी बड़े निर्णयों में हिस्सेदारी होती है। शंकराचार्य चयन प्रक्रिया से लेकर अन्य धर्मगुरुओं और सनातन धर्म से जुड़े मुद्दों तक, सांस्कृतिक और धार्मिक निर्णयों में काशी विद्वत परिषद की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है। काशी विद्यार्थी परिषद के अध्यक्ष, महामंत्री, संगठन मंत्री, ज्योतिष प्रकोष्ठ के साथ-साथ सनातन परंपरा को धार्मिक विविधता में एक सूत्र में पिरोकर सनातन के रक्षकों द्वारा लिए गए निर्णय इसी संस्था के अंतर्गत लिए जाते हैं। 13 से अधिक राज्यों में फैली यह संस्था काशी से ही संचालित होती है। विद्वान, कर्मकांडी और ज्योतिषी इस संस्था के सदस्य और पदाधिकारी बनाए जाते हैं। जिसके लिए साधु-संतों का समुचित सहयोग मिलता है। वर्तमान में प्रख्यात संस्कृत विद्वान और पद्मभूषण प्रोफेसर वशिष्ठ त्रिपाठी काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष हैं।

